The smile that curls on his lips…And twinkles in his eye…His words…the intentional and unintentional humor…has me in splits…the riot of ideas…the sheer imagination…the thought itself has me glued…the songs he hums…his weird interests…his lack of any patience or loyalty to any idea or work…his narcissistic obsession with self…thoughtless words that can pierce your heart…never acknowledging…
an anomaly in my life…still an inseparable part of my life…
Thursday, July 2, 2009
Wednesday, June 17, 2009
For dramatic effect...
on a cleaning spree...
the cobwebs...
the skeletons...
moulding fungus infected memories...
the cobwebs...
the skeletons...
moulding fungus infected memories...
Thursday, June 11, 2009
It’s time to start over…Dos and Donts…
• I don’t want to know anyone who doesn’t want to know me…
• I don’t want to know anyone whose name begins with “A”…it’s cursed for me
• I don’t want to have any of those so called friends who don’t bother
• I am not going to call people who don’t miss my calling them…
• I am not going to spend time logged in on Gmail or face book etc…
To be updated...
• I don’t want to know anyone whose name begins with “A”…it’s cursed for me
• I don’t want to have any of those so called friends who don’t bother
• I am not going to call people who don’t miss my calling them…
• I am not going to spend time logged in on Gmail or face book etc…
To be updated...
Sunday, June 7, 2009
Friday, May 29, 2009
रिश्ते...
हर रिश्ता चाँद से ट्पकी
सफ़ेद स्याही से लिखा लगता है...
या फिर लगता है जैसे
उथल पुथल मची हो एक गगरी में...
शायद एक कण में कायानत ढूँढने की कोशिश...
या साहिल की ओट में छुपी मृगतृष्णा...
सफ़ेद स्याही से लिखा लगता है...
या फिर लगता है जैसे
उथल पुथल मची हो एक गगरी में...
शायद एक कण में कायानत ढूँढने की कोशिश...
या साहिल की ओट में छुपी मृगतृष्णा...
Sunday, April 26, 2009
रातों से लंबी रातों कि परतें...
The thought is very disjointed and i feel does not fully convey what i want to say...
रात को एक खिड़की से देखा तो बस रात इतनी गहरी थी की ऐसा लगा की रात की गहराई मी अंदर उत्तर गयी है...मॅन में एक हलचल सी हुई और ऐसा लगा की किसी तरह अपने को देखूं रात के बिना...फिर ऐसा लगा की रात की परतें हैं मेरे चेहरे पे और शायद और अगर में रात की परतें उतार दूं तो रात मुज़से अलग हो जाएगी...एक एक करके में रात की परतें उत्तार ने लगती हून अपने चहेरे से...पर परतें ख़तम ही नहीं होती...रातें ख़तम हो जाती हैं पर रातों की परतें अभी भी वहीं हैं...
रात को एक खिड़की से देखा तो बस रात इतनी गहरी थी की ऐसा लगा की रात की गहराई मी अंदर उत्तर गयी है...मॅन में एक हलचल सी हुई और ऐसा लगा की किसी तरह अपने को देखूं रात के बिना...फिर ऐसा लगा की रात की परतें हैं मेरे चेहरे पे और शायद और अगर में रात की परतें उतार दूं तो रात मुज़से अलग हो जाएगी...एक एक करके में रात की परतें उत्तार ने लगती हून अपने चहेरे से...पर परतें ख़तम ही नहीं होती...रातें ख़तम हो जाती हैं पर रातों की परतें अभी भी वहीं हैं...
Saturday, April 11, 2009
छुपाया तो मैने ही था कहीं...
I think its very wannabe but since i wrote it i am posting it...
छुपाया तो मैने ही था कहीं
चीनी के डब्बे के पीछे
रात के सिरहाने के नीचे
एक पुरानी किताब के पन्नों के बीच में
या फिर बर्गद के पेड़ की जड़ों की ओट में
सपनों के सपनों में
तेरे कुछ कहने के इंतेज़ार में
छुपाया तो मैने ही था कहीं...
छुपाया तो मैने ही था कहीं
चीनी के डब्बे के पीछे
रात के सिरहाने के नीचे
एक पुरानी किताब के पन्नों के बीच में
या फिर बर्गद के पेड़ की जड़ों की ओट में
सपनों के सपनों में
तेरे कुछ कहने के इंतेज़ार में
छुपाया तो मैने ही था कहीं...
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