Showing posts with label Poetry. Show all posts
Showing posts with label Poetry. Show all posts

Sunday, June 19, 2016

माज़ी

आब ओ अब्र के दरमियाँ
वो वहां के मुझे पता नहीं
साहिल की तरफ रुख था मेरा
कश्ती जैसे आप ही पानी पे चल रही हो
अजीब सा सुकून था
जैसे मंज़िल दुर नहीं मेरे पास ही थी
ना हम-साज़ , ना कोई हम-राह
मेरा सफर और मेरी मंज़िल
ऐसा लगा जैसे एक  ज़माना बीत गया हो
या फिर कल की ही कोई बात हो
....
अंजान थी मैं...या फ़िर बेपरवाह
उस कश्ती को रफ़ीक़-ए -रूह समझी
जो कश्ती माज़ी के सिफ़र में ग़ुम थी

Tuesday, July 12, 2011

फ़िराक...

The biggest loss is the loss of innocence...

वही झरोखों पर पड़ी एक काली परत...
ज़िन्दगी के कुछ लम्हों से
उधार ली रौशनी तक नहीं झाक पाती है उन मैले कुचेले पर्दों से
रात की परतें मैं हटाती रहती हूँ अपनी हथेलियौं से
मंटो की कहानियों के शब्द आज भी मेरी पेशानियौं पे दस्तक दे रहे हैं
उसकी भू अब भी शायब मेरे जिस्म से ही आ रही है
एक वही स्याह परत फिर से थी दिल्ली की गलियौं में
अभी जैसे कल की ही बात हो
माँ चुप करा देती थी अपने घर के चौराहे पे
जैसे किसी की मज़ार पे नमन कर रहे हो
गुरुद्वारा हुआ करता था वहां पे, १९८४ से पहले
और फिर वही परतें
गुजरात की गलियों में
कहीं कुछ नहीं बदला
तारिकों के अलावा...

Friday, July 1, 2011

कुछ यूँ भी तो हो

कुछ यूँ भी तो हो
तेरे सामने बैठ कर भी हम कुछ कह पाएं
आँखों से टपकती बूंदों के
कुछ माने समझा पाएं
कुछ यूँ भी तो हो
दिल की जो आरज़ू कभी कही न गयी हमसे
इस बार तेरे हाथों पर
बे-झिझक ही लिख जाएँ
कुछ यूँ भी तो हो
अपनी गरज में ही सही लेकिन
इस बार तेरे कदम
मेरे दर पर आके रुक जाएँ
कुछ यूँ भी तो हो...

Thursday, March 10, 2011

तेरे साथ...

एक डोर से बंधा है शायद
तेरे हाथों की लकीरों के साथ
तेरे माथे की शिकन...
तेरे होंटों की गर्मी में कहीं
गुम है मेरा आप...

मेरे कानों से होकर गुज़रे
तेरे कुछ कहे अनकहे शब्द
एक माला में पिरोती बैठीं हूँ
उसी डोर के साथ...बंधा है जिससे
धरोहर है एक तेरी मेरे पास
मेरे अन्दर कहीं वरना
गुम ही हो जाता मेरा आप

रिश्ता...

रिश्ता भी क्या चीज़ है? जहाँ कुछ भी नहीं वहां नज़र आता है

जहाँ नज़र नहीं आता वहां है...

अमृता प्रीतम

Sunday, February 27, 2011

शायद...

शायद ज़िन्दगी आज कल में बंध ही जाती तो अच्हा होता…
शायद मेरी परछाई मुझ में ही समां जाती तो अच्छा होता…

आँखों के आलों में लौ जलाई थी तो सही
तेरे आने के इंतज़ार वो बुझ ही जाती तो अच्हा होता...

तुझे खुदा मान के मंजिल की तरफ बढे तो थे लेकिन…
गुमशुदा राहें शायद मिल जाती तो अच्हा होता…

ज़हन में मेरे फिर भी तेरी ही आज़ है…
वो दुआ बनके मुझ पर बरस जाती तो अच्हा होता

Tuesday, July 20, 2010

हिसाब...

एक पहर की बात है यह
या चार पहर, कुछ पता नहीं...
हिसाब कर रहा था वो मेरे सामने
जाने क्या लिखा था उसकी किताब में
उसकी कलम से नज़र हटती ही नहीं थी
आखिर बेताब होकर मैंने पूछ ही डाला...
क्या लिख रहे हैं जनाब
वो मुस्कराते हुए उंगलियाँ गिनने लगा
मैंने फिर कोशिश की...
मैं कुछ गिनती करूं
उसके चेहरे का ताब कुछ अलग ही था
वोह मुझे ऐसे देख रहा था
की मेरे दिल की गहराई पिघल कर उसकी हथेलियौं में समा गयी...
मैंने फिर से उसकी किताब में झाका तो,
उसने खुद ही अपनी किताब मुझे सौप दी
मैंने देखा...बड़ा अटपटा सा लगा...
अरे इस हिसाब में तो कुछ नफ़ा ही नहीं,
सिर्फ नुक्सान ही है मैंने पुछा,
मुझसे क्या पूछ रही है पगली...
मैंने कोई गलती नहीं की जोड़ने में...
तेरे ही दिल से पूछ...
उसी की ही तिशनगी का हिसाब है...

Thursday, April 8, 2010

आईना...

आसिम है मेरा या मेरा रफीक...
मेरे एहसास से अलग तो नहीं...
खुली नज़रों से देखा कोई सपना शायद..
मेरी आरज़ू का कातिब शायद...
मेरा वजूद उससे जुदा तो नहीं...
लिखता है वो काफूर सा मेरा अफसाना...
कागज़ नहीं कलम भी नहीं...
मदहोश हूँ मैं मेरी ही आज़ में...
वो नहीं तो फिर मैं भी नहीं...

Friday, January 29, 2010

राहें...

not really what i want to stay...somehow am not able to put it into words...a very feeble attempt...

कदम जब चले थे, राहें आवारा थी
सोचा था शायद कोई किस्सा मिल जाएगा कहीं...
और कोई नहीं तो मेरा ही सही
वो आगाज़ था मेरी तिश्नगी का...
उन दिनों
रातें गुमशुदा थीं और दिन खानाबदोश
मैं दीवानगी में चलती रही और देख ही ना पाई की
हर रास्ता उसी मोड़ पे आकर रुकता है
जहाँ से मैंने शुरुआत की थी...

Monday, December 21, 2009

यादें...

लिखना चाहा तेरी यादों को,
कुछ कही अनकहीं बातों को,
रेत के टीलों पे गुज़री शामों को,
रात से शर्माती सुबह को,
लिखना तो चाहा था...
यादों को लिखने लगी तो लगा...
मेरी कलम तेरा वजूद बन गयी है...
और स्याही में जैसे मेरी आज़ घुल गयी है...
दानिस्तः मैंने कलम को स्याही में डूबोया...
कलम जड्कने लगी तो स्याही और कलम जैसे एक हो गए थे...
फासला करती भी तो कैसे...
फिर सोचा की टीले पर जाकर वही सूरज को रेत में बदलते देखती हूँ...
शायद कुछ कह पाऊँ...शायद कुछ लिख पाऊँ...
पर सूरज की भी जात देखो...
उस दिन कम्भक्त ढला ही नहीं...
बस अपनी गर्मी चाँद को सोपकर जाने कहाँ गुम हो गया...
और में इंतज़ार करती हुई उसके पाऊँ के निशान भी ना देख पायी..
रात का आखरी पहर बचा था...
वोह भी बस चाँद का हाला बनकर मुस्कुराती सी मेरा हाथ छोड़कर चलदी...
सुबह तो वैसे भी रात की जाई है...
क्या कहती और क्या लिखती...

Wednesday, September 30, 2009

जीने के करीने...

किसी शहर की गलियों या कूचों में...
कहीं झीलों तालाबों या नदियों की लहरों में...
डूबे हुए दिल की गहरायी में...
अतरंगी से ख्वाबों के हुजूम में...
किसी शायर की ग़ज़ल में...
किसी कलाकार के मुजस्समे में...
एक अधूरी लिखी कहानी में...
एक उलझे से किरदार में...
शायद मेरी आज़ में...

Thursday, August 20, 2009

मायाजाल ...

हर सपना देखा सा लगता है
हर आइना बिखरा सा लगता है
तेरी नज़र मेरी रूह पिघला रही है, और
हर लम्हा बेमानी सा लगता है
मैं जहाँ थी अभी भी वहीँ हूँ
हर कोई जो पास था
अब धुंधला सा लगता है...

Wednesday, July 15, 2009

किस्मत...

कतरणें हैं रिश्तों की
चाहतों का ताना बाना है
मेरी किस्मत मेरे कल का कसीदा बुन रही है
मुस्कुराती सी मेरे आज पर...

Wednesday, June 17, 2009

For dramatic effect...

on a cleaning spree...
the cobwebs...
the skeletons...
moulding fungus infected memories...

Friday, May 29, 2009

रिश्ते...

हर रिश्ता चाँद से ट्पकी
सफ़ेद स्याही से लिखा लगता है...
या फिर लगता है जैसे
उथल पुथल मची हो एक गगरी में...
शायद एक कण में कायानत ढूँढने की कोशिश...
या साहिल की ओट में छुपी मृगतृष्णा...

Sunday, April 26, 2009

रातों से लंबी रातों कि परतें...

The thought is very disjointed and i feel does not fully convey what i want to say...

रात को एक खिड़की से देखा तो बस रात इतनी गहरी थी की ऐसा लगा की रात की गहराई मी अंदर उत्तर गयी है...मॅन में एक हलचल सी हुई और ऐसा लगा की किसी तरह अपने को देखूं रात के बिना...फिर ऐसा लगा की रात की परतें हैं मेरे चेहरे पे और शायद और अगर में रात की परतें उतार दूं तो रात मुज़से अलग हो जाएगी...एक एक करके में रात की परतें उत्तार ने लगती हून अपने चहेरे से...पर परतें ख़तम ही नहीं होती...रातें ख़तम हो जाती हैं पर रातों की परतें अभी भी वहीं हैं...

Saturday, April 11, 2009

छुपाया तो मैने ही था कहीं...

I think its very wannabe but since i wrote it i am posting it...

छुपाया तो मैने ही था कहीं
चीनी के डब्बे के पीछे
रात के सिरहाने के नीचे
एक पुरानी किताब के पन्नों के बीच में
या फिर बर्गद के पेड़ की जड़ों की ओट में
सपनों के सपनों में
तेरे कुछ कहने के इंतेज़ार में
छुपाया तो मैने ही था कहीं...

Monday, April 6, 2009

सफेद इन्द्राधनुष...

कितने दिनो से सोच रहीं हूँ की कुछ लिखूं...एक सपना जो एक रात को देखा था और जो मेरे ज़हन पे एक तस्वीर छोड़ गया...शायद अगर में कलाकार होती तो इस सपने को रेखाओं में खीच कर एक कॅन्वस में उत्तार देती... शायद शब्दों में वो सपना गुम ना हो जाए...कोशिश करती हूँ

मैनें देखा एक मिट्टी के मटकी रखी है...और उसमे इन्द्राधनुष के रंग भरे हैं...मैं उस मटकी के पास एक सफेद रंग की सारी पहने खड़ी हून...और मेने अपने सारी के पल्लू को उस मटकी में डोबोया...पल्लू मटकी से बाहर निकाला तो देखा की पल्लू अभी भी सफेद है...मैं परेशान होकर पल्लू ज़ोर से ज़टकने लगती हून और देखती हून कि रंगों की बूँदें पल्लू में से गिर रहीं हैं पर मेरी सारी का पल्लू अभी भी सफेद है...

ज़िंदगी जी लेते बस...

कभी कभी लगता है
ज़िंदगी जी लेते बस
गर्म गर्म शाख पर
पत्ते पिरों लेते बस
ठंडी नीली ल़हेरॉं पर
चाँद सूखा लेते बस
कभी कभी लगता है
ज़िंदगी जी लेते बस...